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क्या सच में हम अपनी जड़ों से दूर हो रहे हैं? आधुनिक महिलाओं की बदलती सोच और संस्कृति

समय के साथ महिलाओं की सोच और उनका धर्म के प्रति नजरिया बदलता जा रहा है। पहले की महिलाएँ पूजा-पाठ में अधिक समय देती थीं, परिवार को जोड़कर रखती थीं और परंपराओं का सम्मान करती थीं। लेकिन आज के समय में आधुनिक जीवनशैली और बाहरी प्रभावों के कारण ये संस्कार धीरे-धीरे कमजोर हो रहे हैं। क्या इसका कारण मोबाइल, टीवी, फिल्में और वेब सीरीज हैं, या फिर यह मानसिकता ही बदल गई है? आइए इस विषय पर गहराई से विचार करें।

Author: S K SinghLast Updated:
भारतीय संस्कृति और आधुनिकता के बीच संघर्ष करती महिलाएँ - बदलती सोच, परिवार, और धार्मिक आस्थाओं पर प्रभाव

पहले की महिलाएँ और धर्म के प्रति आस्था

हमारी दादी-नानी के जमाने में महिलाएँ धर्म और आस्था में गहराई से जुड़ी होती थीं। घरों में सुबह-शाम पूजा होती थी, व्रत-त्योहारों को पूरी श्रद्धा से मनाया जाता था और परिवार के सभी लोग एक साथ रहते थे। महिलाएँ अपने बच्चों को भी इन संस्कारों से जोड़ती थीं, जिससे अगली पीढ़ी भी धार्मिक और नैतिक मूल्यों को समझ पाती थी।

बदलते समय के साथ महिलाएँ धर्म से दूर क्यों होती जा रही हैं?

आज की व्यस्त जीवनशैली, नौकरी, करियर और मोबाइल-इंटरनेट की बढ़ती लत के कारण महिलाएँ धार्मिक कार्यों से दूर होती जा रही हैं। पहले जहां महिलाएँ घर की लक्ष्मी मानी जाती थीं, वहीं अब वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की दौड़ में अपने पारंपरिक मूल्यों को पीछे छोड़ती जा रही हैं।

  1. समय की कमी – पहले महिलाएँ घर के कामों के साथ पूजा-पाठ को भी प्राथमिकता देती थीं, लेकिन अब नौकरी और आधुनिक जीवनशैली के कारण उनके पास समय नहीं बचता।
  2. बदलती प्राथमिकताएँ – अब जीवन में पूजा-पाठ, संस्कार और परिवार से ज्यादा व्यक्तिगत आजादी और करियर को महत्व दिया जाता है।
  3. मीडिया और मनोरंजन का प्रभाव – फिल्मों, वेब सीरीज और सोशल मीडिया ने लोगों की मानसिकता को तेजी से बदला है। इनमें पारिवारिक और धार्मिक मूल्यों की जगह आधुनिक सोच को प्राथमिकता दी जाती है।
  4. ग्लोबल कल्चर का प्रभाव – भारत धीरे-धीरे विदेशी संस्कृति को अपनाने लगा है, जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अलग रहने की मानसिकता को बढ़ावा दिया जाता है।

शादी और रिश्तों में भी आ रहे हैं बदलाव

पहले शादी को सात जन्मों का बंधन माना जाता था, लेकिन अब रिश्ते तेजी से बनते और टूटते हैं। लव मैरिज, लिव-इन रिलेशनशिप और तलाक की बढ़ती संख्या इस बदलाव को दर्शाती है।

  • संयुक्त परिवारों का टूटना – पहले बड़े-बुजुर्गों के साथ रहना गर्व की बात मानी जाती थी, लेकिन अब युवा पीढ़ी अलग रहने को ज्यादा पसंद करती है।
  • माता-पिता के प्रति सम्मान में कमी – पहले माता-पिता का कहना अंतिम निर्णय होता था, लेकिन आज की पीढ़ी खुद को ज्यादा समझदार मानती है और स्वतंत्र निर्णय लेना चाहती है।

भारत एक विदेशी देश बनता जा रहा है?

भारत धीरे-धीरे अपनी संस्कृति और परंपराओं को भूलकर विदेशी जीवनशैली अपना रहा है। यह बदलाव सिर्फ पहनावे या खानपान तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिकता में भी दिखने लगा है।

  • पहले परिवार मिलकर त्योहार मनाते थे, अब सिर्फ सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर त्योहार "मनाए" जाते हैं।
  • पहले गली-मोहल्ले में बच्चे खेलते थे, अब मोबाइल और वीडियो गेम में खो जाते हैं।
  • पहले लोग अपने रिश्तेदारों से मिलने जाते थे, अब सिर्फ वीडियो कॉल पर बात होती है।

क्या किया जा सकता है?

अगर हमें अपनी संस्कृति को बचाना है तो हमें खुद जागरूक होना होगा।

  1. परिवार को समय दें – संयुक्त परिवार की परंपरा को फिर से जीवंत करें और माता-पिता के साथ रहें।
  2. धार्मिक और नैतिक मूल्यों को अपनाएँ – बच्चों को धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ें।
  3. मीडिया के प्रभाव से बचें – फिल्मों और सीरीज से ज्यादा अपनी असली जिंदगी और रिश्तों पर ध्यान दें।
  4. संस्कारों को महत्व दें – अपने बच्चों को बचपन से ही अच्छे संस्कार दें ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहें।

निष्कर्ष:

समय बदल रहा है, लेकिन हमें यह तय करना होगा कि हमें किस दिशा में बढ़ना है। आधुनिकता को अपनाना गलत नहीं है, लेकिन अपनी परंपराओं और संस्कृति को छोड़ देना भी सही नहीं है। महिलाएँ घर और समाज की रीढ़ होती हैं, अगर वे चाहें तो इस बदलाव को एक सही दिशा दे सकती हैं। अब हमें फैसला करना है – क्या हम अपनी जड़ों से और दूर होंगे, या अपनी संस्कृति को फिर से संजोएँगे?

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