डॉ. राम मनोहर लोहिया: समाजवाद के प्रखर प्रवक्ता और आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा !
डॉ. राम मनोहर लोहिया भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानी, समाजवादी विचारक और क्रांतिकारी नेता थे। उन्होंने जीवनभर समाज में समानता, जाति-व्यवस्था के उन्मूलन और गरीबों के हक की लड़ाई लड़ी। उनका संघर्ष आज भी हमें प्रेरणा देता है, खासकर युवा पीढ़ी को, जो भारत के भविष्य का निर्माण करेगी।

डॉ. लोहिया का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में हुआ था। उनके पिता हीरालाल गांधी जी के अनुयायी थे, जिससे लोहिया जी का झुकाव भी बचपन से ही स्वतंत्रता संग्राम की ओर हो गया। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और फिर जर्मनी के बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
डॉ. लोहिया ने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। वे अंग्रेजों के खिलाफ निडर होकर लड़े और कई बार जेल भी गए। 1934 में उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
समाजवाद और राजनीतिक विचारधारा
डॉ. लोहिया का मानना था कि समाजवाद को भारतीय संस्कृति के अनुसार ढालकर लागू किया जाना चाहिए। वे जाति प्रथा, लैंगिक भेदभाव और आर्थिक असमानता के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने नारा दिया – "सप्त क्रांति", जिसमें उन्होंने सात सामाजिक और आर्थिक सुधारों की बात की।
उनका यह मानना था कि देश में जब तक गरीबी, बेरोजगारी और जातिगत भेदभाव समाप्त नहीं होते, तब तक समाज का वास्तविक विकास नहीं हो सकता। वे मानते थे कि सत्ता का उद्देश्य जनता की सेवा करना होना चाहिए, न कि निजी स्वार्थों की पूर्ति।
आज की युवा पीढ़ी को क्या सीखना चाहिए?
डॉ. लोहिया के विचार और संघर्ष आज के युवाओं के लिए एक बड़ा संदेश हैं।
- निडरता और साहस: वे कभी अन्याय के सामने झुके नहीं। आज की युवा पीढ़ी को भी अपने अधिकारों और सच्चाई के लिए डटकर खड़ा होना चाहिए।
- समानता की भावना: जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव को खत्म करना चाहिए। सभी को समान अवसर मिलना चाहिए।
- स्वतंत्र सोच: लोहिया जी ने हमेशा तर्क और विचारों की स्वतंत्रता की वकालत की। युवाओं को अपनी सोच को स्वतंत्र रखना चाहिए और सही-गलत को समझने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।
- राजनीतिक जागरूकता: वे मानते थे कि अगर राजनीति साफ-सुथरी नहीं होगी तो देश का भला नहीं हो सकता। युवाओं को राजनीति को समझना और उसमें भाग लेना चाहिए।
- शिक्षा और ज्ञान: उन्होंने जीवनभर शिक्षा पर जोर दिया। युवाओं को सिर्फ डिग्री तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सही ज्ञान अर्जित कर समाज में बदलाव लाने का प्रयास करना चाहिए।
डॉ. लोहिया की विरासत
डॉ. लोहिया का निधन 12 अक्टूबर 1967 को हुआ, लेकिन उनके विचार और योगदान आज भी प्रासंगिक हैं। उनकी स्मृति में कई संस्थानों और सड़कों का नामकरण किया गया, जिनमें दिल्ली का राम मनोहर लोहिया अस्पताल प्रमुख है।
आज के युवाओं को उनके विचारों से प्रेरणा लेनी चाहिए और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए। सच्चे समाजवाद और समानता की भावना के साथ ही भारत का भविष्य उज्ज्वल बन सकता है।
"जो लोग सपने देखने का साहस रखते हैं, वही समाज में बदलाव ला सकते हैं।" - डॉ. राम मनोहर लोहिया
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